निरीश्वरमिदं प्राहुः सेश्वरं च तथापरे ।
वदन्ति विविधैर्भेदैः सुयुक्त्यास्थितिकातराः ।।
जहाँ कुछ लोग ईश्वरीय सत्ता को नहीं मानते, वहीं कुछ व्यक्ति समस्त जगत को ईश्वरमय देखते हैं। इस प्रकार अनेक लोग अनेक प्रकार के मतों का कथन करते तथा अपने-अपने मत पर अटल रहकर कार्य करते हैं।
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