मांस, अस्थि, स्नायु (नस) तथा मज्जा आदि नाड़ियों से आबद्ध शरीर भोग-मन्दिर के रूप में बनकर दुःख का कारण बनता है। तात्पर्य यह है कि यह शरीर ही दुःखरूप है। अतः मायाजाल में पड़कर शरीराभिमान करना निरर्थक है।
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