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शिव संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 39
रज्जुज्ञानाद्यथा सर्पों मिथ्यारूपो निवर्तते । आत्मज्ञानात्तथा याति मिथ्याभूत मिदं जगत् ।।
किन्तु जिस समय रस्सी के वास्तविक रूप का ज्ञान हो जाता है उस समय सर्प का मिथ्या ज्ञान दूर हो जाता है, उसी प्रकार आत्म ज्ञानोदय होने पर मिथ्या जगत की बुद्धि नहीं रह जाती।
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