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शिव संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 43
यथा दोषवशाच्छुक्लः पीतो भवति नान्यथा । अज्ञानदोषादात्मापि जगद्भवति दुरस्त्यजम् ।।
जिस प्रकार पित्तविकार के कारण पाण्डुरोग (कामला रोग) हो जाने से शरीर का वर्ण पीला दिखाई देता है उसी प्रकार ज्ञानदोष के फलस्वरूप यह आत्मा भी मिथ्या जगत के रूप में जान पड़ने लगता है। इस प्रकार की अज्ञानता सहज ही नहीं मिट पाती।
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