देश-काल के विचार से वह अवच्छिन्न नहीं है। अर्थात् उसमें न तो देश-कालादिकों के कोई नियम होते हैँ ओर न ही संकुचन ओर विस्तरण के। अतः आत्मा सदैव ही अपने आप में परिपूर्ण रहता है।
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