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शिव संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 21
द्विविधः कर्मकाण्डः स्यान्निषेधविधिपूर्वकः । निषिद्धकर्मकरणे पापं भवति निश्चितम् । विधिना कर्मकरणे पुण्यं भवति निश्चितम् ।।
कर्मकाण्ड भी निषेधित और विधिक भेदानुसार दो प्रकार का कहा गया है। निषिद्ध कर्म करने से मनुष्य अवश्य ही पातकी कहलाता है तथा विधिक कर्म करने के फलस्वरूप वह निश्चय ही पुण्यलाभ का भागी बनता है।
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