द्विविधं तु फलं ज्ञेयं स्वर्ग नरकमेव च ।
स्वर्गे नानाविधं चैव नरके च तथा भवेत् ।।
कर्मफल की प्राप्ति दो रूपों में हुआ करती है। एक है स्वर्गभोग और दूसरा है नरकभोग। ये दोनों ही अनेक प्रकार के कहे जाते हैं। इस जीव द्वारा पुण्यकार्य किये जाने पर स्वर्ग-सुख की प्राप्ति तथा पापकर्म के करने से नरकवास के कष्टों को भुगतना पड़ता है।
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