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शिव संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 38
सर्पबुद्धिर्यथा रज्जौ शुक्तौ वा रजतभ्रमः । तद्वदेवमिदं विश्वं विवृतं परमात्मनि ।
पुनः माया का आवरण हट जाने पर केवल एक ब्रह्म ही शेष रह जाता है। जिस प्रकार रस्सी में साँप और सीप में चाँदी का बोध होता है उसी भाँति पब्रह्म में माया के आवरण से जगत का भ्रम उत्पन्न होता है।
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