सत्त्वाधिका च या विद्या लक्ष्मीः स्याद्दिव्यरूपिणी ।
चैतन्यं तदुपहितं विष्णुर्भवति नान्यथा ।।
यही माया जब सत्त्वगुण को ग्रहण कर लेती है तब वह दिव्यस्वरूपिणी लक्ष्मी बनकर विष्णुरूप चैतन्य का आविर्भाव करती है।
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