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शिव संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 9
एतन्मतावलम्बी यो लब्ध्वा दुरितपुण्यके । भ्रमतीत्यवशः सोऽत्र जन्ममृत्युपरम्पराम् ।।
जिसके फलस्वरूप अनुष्ठानकर्ता बार-बार आवागमन के चक्रव्यूह में फँसकर संसार में परिभ्रमित होता रहता है। अर्थात् अभिप्राय यह है कि शुभ कार्यों के सम्पादन से चित्त का शुद्धिकरण तो सम्भव हो जाता है किन्तु मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होना कदापि सम्भव नहीं होता।
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