ऐसी स्थिति में मनुष्य ग्राह्य-अग्राह्य मतों का विश्लेषण नहीं कर पाता। फलतः वह जीवन पर्यन्त भ्रमित होकर भटकता रहता है और मोक्षमार्ग तक नहीं पहुँच पाता। ऐसे विवादी पुरुषों का मत वर्णन करने में मैं सर्वथा ही अपने को असमर्थ पाता हूँ। अर्थात् प्राणी मुक्तिमार्ग की राह छोड़कर व्यर्थ ही इतस्ततः भटकता फिरता है।
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