आत्मज्ञान-सम्बन्धी शास्त्र के अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि ईश्वर की उपाधि से युक्त इन्द्रादि देव भी अनित्य हैँ अर्थात् उनका भी संसार में जन्म-मरण होता रहता है।
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