सम्पूर्ण संसार की उत्पत्ति-स्थिति का एकमात्र कारण कर्म ही होता है अर्थात् कर्म के द्वारा क्लेशादि उत्पन्न होते हैं। कर्म के अभाव में किसी प्रकार के दुःख की सम्भावना नहीं रह जाती। जिस क्षण आत्मा माया की उपाधि को विजित कर मायाविहीन हो जाता है तभी उसे अखण्ड ज्ञानरूप विशुद्ध ब्रह्म की प्रतीति होने लगती है।
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