आत्मा वा रे च श्रोतव्यो मंतव्य इति यच्छ्रुतिः ।
सा सेव्या तत्प्रयत्नेन मुक्तिदा हेतुदायिनी ।।
आत्मा ही मुक्तिप्रदायिनी और सभी की उत्पन्नकर्जी है। अतः प्राणी को चेष्टापूर्वक आत्मा का सेवन करना ही उचित है।
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