इस जगत में जितने भी नाम और रूप के देवता है वे सभी एक परमात्मा में ही दिखाई पड़ते हैं, किन्तु शरीरादि समस्त जड़ वस्तुएँ उसी एक आत्मा में अवस्थित होने के फलस्वरूप आत्मा से भिन्न जान पड़ती हैं।
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