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शिव संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 40
रौप्यभ्रान्तिरियं यांति शुक्तिज्ञानाद् यथा खलु । जग‌द्घान्तिरियं यांति चात्मज्ञानाद्यथा तथा ।।
इसी भाँति जब मन में यह दृढ़ निश्चय हो जाता है कि यह वस्तुतः सीप है तो उसमें चाँदी के होने वाला भ्रम नहीं रहता। इसी प्रकार आत्मबोध हो जाने पर संसार का भ्रम दूर हो जाता है।
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