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शिव संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 100
बिन्दुः शिवो रजः शक्तिरूभयोर्मिलनात् स्वयम् । स्वप्नभूतानिजायन्ते स्वशक्तत्याजडरूपया ।।
शिवरूप बिन्दु (वीर्य) और शक्तिरूप रज - इन दोनों के मिलन से ही यह शक्तिरूप जड़ माया अपने प्रभुत्व से स्वप्नवत् शरीरोत्पत्ति किया करती है।
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