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शिव संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 47
यथा वातवशात्सिन्धावुत्यन्नाः फेनबुद॒बुदाः । तथात्मनि समुद्धूतं संसारं क्षणभङ्गुरम्‌ ।।
जिस प्रकार वायु के थपेड़ से सागर में ज्याग उठते ओर बुलबुले उत्पन्न होते रहते हैँ तथा पुनः तत्क्षण ही उसमें समा जाते है, उसी प्रकार माया की उपाधि से विभूषित आत्मा के द्वारा नश्वर संसार की उत्पत्ति होती ओर पुनः उसी आत्मा मे विलुप्त हो जाती है।
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