विधिक कर्म तीन प्रकार के माने जाते हैं, जैसे - नित्यकर्म, नैमित्तिक कर्म और सकाम कर्म। नित्यकर्म वह है जिसके अन्तर्गत प्रतिदिन देवार्चन तथा सन्ध्या-वन्दन करने का विधान है। नैमित्तिक कर्म वह है जिसे किसी विशिष्ट पर्वकाल (ग्रहण आदि) अथवा किसी तीर्थस्थान के जलाशय में मार्जन, स्नान-दानादि के द्वारा किया जाता है, किन्तु सकाम कर्म फलप्राप्ति के उद्देश्य से सम्पत्र किये जाते हैं।
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