मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें

अध्याय 12 — बारहवां अध्याय

मनुस्मृति
126 श्लोक • केवल अनुवाद
(महर्षियों ने भृगुजी से पूछा कि) हे निष्कल्मष भृगुजी! (आपने अवान्तर भेदों के सहित) चारों वर्णो के समस्त धर्म को कहा, (अब जन्मान्तर के शुभाशुभ) कर्मो के परमार्थ रूप से फल की प्राप्ति को हम लोगों से आप कहिये।
धर्मात्मा मनुपुत्र भृगुजी ने उन (महर्षियों) से कहा कि इन सब कर्म सम्बन्ध के निर्णय को (आप लोग) सुनिये।
मनुष्यों के कायिक, वाचिक तथा मानसिक कर्म शुभाशुभ फल देने वाले होते हैं और उनसे उत्पन्न होने वाली मनुष्यों की उत्तम (देव), मध्यम (मनुष्य आदि) तथा अभ्रधम (तिर्यक्‌ आदि) गतियाँ (जन्म) भी होती हैं।
(उत्तम, मध्यम तथा अधम भेद से) तीन प्रकार के तथा (मन, वचन तथा शरीर आश्रित होने से) तीन अधिष्ठान वाले दश लक्षणों (१२।५-७) से युक्त देही (जीव) के मन को (कर्म में) प्रवृत्त करने वाला जाना।
(१) दूसरे के द्रव्य को अन्याय से भी लेने का विचार करना, (२) मन से निषिद्ध कार्य (ब्रह्महत्यादि पाप कर्म) करने की इच्छा करना, (३) असत्य हठ (परलोक आदि कुछ भी नहीं है, यह देह ही आत्मा है, इत्यादि रूप से दुराग्रह) करना, ये तीन प्रकार के मानसिक (अशुभ) कर्म हैं।
(४) कटु बोलना, (५) झूठ बोलना, (६) परोक्ष में किसी का दोष कहना और (७) निष्प्रयोजन (बेमतलब की) बातें करना; ये चार प्रकार के वाचिक (अशुभ) कर्म हैं।
(८) बिना दी हुई (दूसरे की) वस्तु को लेना, (९) शास्र-वर्जित हिंसा करना और (१०) परस्त्री के साथ सम्भोग करना; ये तीन प्रकार के शारीरिक (अशुभ) कर्म हैं (इस प्रकार ये १० प्रकार के (अशुम) कर्म हैं)।
यह (देही-जीव) मानसिक कर्मो के फल को मन से वाचिक कर्मो के फल को वचन से और शारीरिक कर्मो के फल को शरीर से ही भोगता है।
मनुष्य शरीरिक (१२।७) कर्म के दोषों से स्थावर (वृक्ष, लता, गुल्म, पर्वत आदि) योनि को, वाचिक (१२1६) कर्म के दोषों से पक्षी, मृग (पशु, कीट, पतङ्ग आदि) योनि को और मानसिक (१२।५) कर्म के दोषों से अन्त्य जाति (चण्डाल आदि हीन जाति) को प्राप्त करता है।
जिसकी बुद्धि (विचार-मन) में वाग्दण्ड, मनोदण्ड और शरीरदण्ड; ये तीनों स्थित हैं, वही (सच्चा) 'त्रिदण्डी' (तीन दण्डों वाला-संन्यासी) कहा जाता है, (केवल बाँस का तीन दण्ड धारण करनेवाला ही संन्यासी नहीं है)।
जब मनुष्य काम तथा क्रोध को रोककर सब जीवों में इस त्रिदण्ड (कायिक, वाचिक तथा मानसिक दण्ड) को व्यवहत करता है, तब सिद्धि (मुक्ति) को प्राप्त करता है।
जो इसे (शरीर को) कार्यो में प्रवृत्त करता है उसे पण्डित लोग क्षेत्रज, और जो कार्यों को करता हे उसे “भूतात्मा” कहते हैं।
सब प्राणियों का सहज (एक साथ में उत्पन्न) 'जीव' नाम का दूसरा ही आत्मा अर्थात्‌ 'जीवात्मा' है, जो प्रतिजन्म में सब सुख-दु:ख का अनुभव करता है।
पञ्च महाभूत (पृथ्वी, जल, वायु, जेज और आकाश) से मिले हुए वे दोनों महान्‌ तथा क्षेत्रज्ञ - छोटे-बड़े सब भूतात्माओं में स्थित उस परमात्मा में व्याप्त होकर रहते हैं।
उस (परमात्मा) के शरीर से असङ्कय जीव उत्पन्न (अग्नि से चिनगारी के समान प्रकट) होते हैं, जो छोटे-बड़े प्राणियों को कर्मों में प्रवृत्त करते रहते हैं।
पञ्च महाभूतं (पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश) से ही पापी मनुष्यों की यातनाओं (पापजन्य नरकादि पीड़ाओं) को भोगने के लिए दूसरा (जरायुज से भिन्न) शरीर निश्चित रूप से उत्पन्न होता है।
उस शरीर से यमसम्बन्धिनी यातनाओं को भोगकर वे यथायोग्य उन्हीं पञ्चमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) में लीन हो जाते हैं।
वे शरीर विषय-संसर्ग से उत्पन्न प्रमुख फलों को भोगकर निष्पाप हो महा-बलवान्‌ उन्हीं दोनों (महान्‌ तथा परमात्मा) का आश्रय करते हैं । (उसमें लीन होते हैं)।
वे दोनों (महान्‌ तथा परमात्मा) निरालस होकर उस जीव के (भोगने से बचे हुए) धर्म तथा पाप को एक साथ देखते (विचार करते) हैं, जिनसे संयुक्त जीव मर कर परलोक में) तथा इस लोक में (धर्म से) सुख तथा (पाप से) दुःख को पाता है।
यदि प्राणी मनुष्य-शरीर में अधिक धर्म तथा थोड़ा पाप करता है तो स्थूल शरीर से परिणत उन्हीं पञ्चमहाभूत (पृथ्वी आदि) से स्वर्ग में सुख को भोगता है।
यदि प्राणी मनुष्य-शरीर में अधिक पाप तथा थोड़ा पुण्य करता है तो (मनुष्य-शरीर से परिणत) उन्हीं पञ्चभूतों (पृथ्वी आदि) से त्यक्त होकर अर्थात्‌ मरकर यमयातनाओं को भोगता है।
यम-यातनाओं को भोगकर निष्पाप वह जीव उन्हीं पञ्च महाभूतो (पृथ्वी आदि) के भागों को प्राप्त करता है अर्थात्‌ मानव-जन्म लेता है।
(मनुष्य) इस जीव की धर्म तथा अधर्म के कारण हुई इन गतियों को अपने ही मन से देख (विचार) कर सर्वदा धर्म के तरफ मन को लगावे।
आत्मा (महान्‌) के सत्त्व, रज तथा तम - ये तीन गुण हैं, जिनसे युक्त यह महान्‌ (आत्मा) सम्पूर्ण (चराचर पदार्थों) में व्याप्त होकर स्थित है।
यद्यपि यह सम्पूर्ण जगत्‌ इन तीनों ही गुणों (सत्त्व, रज और तम) से व्याप्त है, (तथापि) इन गुणों में से जो गुण सबसे अधिक होता है, वह गुण उस देहधारी को उस गुण की (अपनी) अधिकता से युक्त कर देता है।
(वस्तु का यथार्थ) ज्ञान सत्त्वगुण, प्रतिकूल ज्ञान तमोगुण और राग-द्रेष (रूप मानसिक कार्य) रजोगुण कहलाता है। सब प्राणियों का आश्रित शरीर इन गुणों का आश्रित है।
उस आत्मा में जो कुछ प्रीति (सुख) से युक्त क्लेशरहित एवं प्रकाशमान लक्षित हो; उसे “सत्त्वगुण" जानना चाहिए।
जो दु:खयुक्त, अप्रीतिकारक तथा शरीरियों को विषयों की ओर आकृष्ट करने वाला प्रतीत हो; उसे सत्त्वज्ञान का प्रतिपक्षी (विरोधी) 'रजोगुण' जानना चाहिये।
जो मोहयुक्त (सत्‌-असत्‌ अर्थात्‌ भले-बुरे विचार से शून्य) हों, जिसके विषय का आकार स्पष्ट हो तथा जो तर्क से शून्य एवं (अन्तःकरण और बहिष्करण द्वारा) दुजञेय हों; उसे 'तमोगुण' समझना चाहिये।
(भृगुजी महर्षियों से कहते हैं कि) इन (१२।२४) तीनों गुणों का (क्रमशः) उत्तम, मध्यम और जघन्य (तुच्छ) जो फलोदय है, उसे अशेषतः (सम्पूर्ण रूप से, मैं) कहुँगा।
वेदों का अभ्यास, (प्रजापत्यादि) तप, (शास्त्र के अर्थ का) ज्ञान, (मिट्टी जल आदि के द्वारा) शुद्धि, इन्द्रियसंयम, (दान आदि) धर्मकार्य और आत्मा (परमात्मा) का चिन्तन; ये सब “सत्त्वगुण” के लक्षण (कार्य) हैं।
(फलतप्राप्त्यर्थ आरम्भ किये गये काम में रुचि होना, धैर्य का अभाव, शास्त्रवर्जित कर्म का आचरण तथा सर्वदा (रूप, रस, शब्द आदि) विषयों में आसक्ति ये राजसिक गुण' के लक्षण हैं।
लोभ, निद्रा, अधैर्य, क्रूरता, नास्तिकता, नित्य कर्म का त्याग, माँगने का स्वभाव होना और प्रमाद-ये “तामसिक” गुण के लक्षण हैं।
तीनो (भूत, भविष्यत्‌ तथा वर्तमान) काल में रहने वाले इन तीनों गुणों (१२।२४) के गुण-लक्षण को क्रमशः संक्षेप में यह (१२।३५-३८) जानना चाहिए।
मनुष्य जिस काम को करके, करता हुआ तथा भविष्य में करने वाला होकर लज्जित होता है; अन सबको विद्वान्‌ "तामस गुण” का लक्षण समझें।
इस लोक में मनुष्य जिस काम में अत्यधिक प्रसिद्धि (नामवरी) को चाहता है और उस काम के असफल होने पर शोक नहीं करता, उसे "राजस गुण" का लक्षण समझें।
मनुष्य जिस काम (वेदार्थ) को सम्पूर्ण आत्मा से अर्थात्‌ सब प्रकार मन लगाकर जानना चाहता है तथा जिस काम को करता हुआ लज्जित नहीं होता और जिस काम से आत्मा प्रसन्न होती है; उसे "सात्त्विक गुण" का लक्षण समझना चाहिए।
तमोगुण का लक्षण काम, रजोगुण का लक्षण अर्थ और सत्त्वगुण का लक्षण धर्म होता है; इनमें-से पहले वाले की अपेक्षा आगे वाला श्रेष्ठ होता है।
(भृगु मुनि महर्षियों से कहते हैं कि) इन तीनों गुणों में से जो मनुष्य जिस गुण के द्वारा जिन संसारों अर्थात्‌ गतियों को प्राप्त करता है, उन सबको संक्षेप से इस संसार के क्रम से कहूँगा।
सात्त्विक (सत्त्वगुण का व्यवहार करने वाले) देवत्व को, राजस (रजोगुण का व्यवहार करने वाले) मनुष्यत्व को और तामस (तमोगुण का व्यवहार करने वाले) तिर्यक्रत्व (पशु-पक्षी, वृक्ष-लता-गुल्म आदि की योनि) को प्राप्त करते हैं; ये तीन प्रकार की गतियाँ हैं।
(सत्त्वादि तीनों गुणों के कारण) तीन प्रकार की ये गतियाँ (देवगति, मनुष्यगति तथा तिर्यग्गति) कर्म तथा विद्या आदि की विशेषता से जघन्य, मध्यम तथा उत्तम - पुनः तीन प्रकार की अप्रधान गतियाँ होती हैं। इस प्रकार ३ x ३ = ९ अप्रधान गतियाँ होती हैं)।
स्थावर (वृक्ष, लता, पर्वत आदि अचर), कृमि (सूक्ष्म कीड़े), कीट (कुछ बड़े कीड़े), मछली, सर्प, कछुआ, पशु, मृग- ये सब जघन्य (हीन) तामसी गतियाँ हैं।
हाथी, घोड़ा, शूद्र, निन्दित म्लेच्छ, सिंह, बाघ और सूअर - ये मध्यम तामसी गतियाँ हैं।
चारण (बन्दी-भाट आदि), सुपर्ण (पक्षी-विशेष), कपटाचारी मनुष्य, राक्षस और पिशाच-ये उत्तम तामसी गतियाँ हैं।
झल्ल मल्ल (१०।२२), नट (रङ्गमञ्च पर अभिनय कर जीविका करने वाले), शस्त्रजीवी (सिपाही, सैनिक आदि), जुआरी तथा मद्यपी पुरुष-ये जघन्य (हीन) राजसी गतियाँ हैं।
राजा, क्षत्रिय, राजाओं के पुरोहित, शास्त्रार्थ आदि के विवाद को पसन्द करने वाले - ये सब मध्यम राजसी गतियाँ हैं।
गन्धर्व, गुह्यक, यक्ष, देवानुचर (विद्याधर आदि) और अप्सराएँ - ये सब उत्म राजसी गतियाँ हैं।
तपस्वी (वानप्रस्थ), यति (संन्यासी-भिक्षु), ब्राह्मण, वैमानिक गण (पुष्पक आदि देव-विमानों से गमन करने वाले देवगण), नक्षत्र और दैत्य (प्रह्लाद, बलि आदि); ये जघन्य सात्तिवकी गतियाँ हैं।
यज्वा (विधिपूर्वक यज्ञानुष्ठान किये हुए), ऋषि, देव, (इतिहास प्रसिद्ध शरीरधारी वेदाभिमानी देव-विशेष), ज्योति (ध्रुव आदि), वर्ष (इतिहास प्रसिद्ध शरीरधारी संवत्सर), पितर (सोमप आदि) और साध्य (देवयोनि-विशेष) - ये मध्यम सात्त्विकी गतियाँ हैं।
ब्रह्मा (चतुर्मुख) विश्वस्रष्टा (मरीच आदि), (शरीरधारी) धर्म, महान्‌, अव्यक्त (साङ्कयप्रसिद्ध दो तत्त्व-विशेष) - इनको विद्वान्‌ उत्तम सात्त्विक गतियाँ कहते हैं।
(भृगुजी महर्षियो से कहते हैं कि) मन, वचन तथा शरीर के भेद से तीन प्रकार के कर्मा को, (सत्त्व, रज और तम रूप) तीन प्रकार के गुणों को और उनके भी सब प्राणी-सम्बन्धी (जघन्य, मध्यम तथा उत्तम भेद से) तीन-तीन प्रकार की सब गतियों को (मैंने) कहा।
इन्द्रियों की (अपने-अपने विषयों में) अत्यधिक आसक्ति होने से, (निषिद्ध कर्म करने पर भी उसकी निवृत्ति के लिए विवाहित प्रायश्चित्त आदि) धर्मकार्य नहीं करने से मूर्ख तथा अधम मनुष्य निन्दित गतियों को पाते हैं।
(भृगुजी महर्षियों से पुन: कहते हैं कि यह जीव इस लोक में जिस-जिस कर्म (के करने) से जिस-जिस योनि को प्राप्त करता है, उन सबको (आप लोग) सुनें।
महापातकी (ब्रह्महत्या आदि (११।५४) करनेवाले) बहुत वर्ष समूहों तक भयङ्कर नरकों को पाकर उनके उपभोग क्षय से इन (आगे (१२।५५-८०) कही जाने वाली गतियों को प्राप्त करते हैं।
ब्रह्मघाती मनुष्य कुत्ता, सूअर, गधा, ऊंट, गौ, बगरी, भेड़, मृग, पक्षी, चण्डाल (१०।१६) तथा पुक्कस (१०।१८) की योनि को प्राप्त करता है।
सुरा पीने वाला ब्राह्मण कृमि (बहुत सूक्ष्म कीड़े), कीट (कृमियों से कुछ बड़े कीड़े), पतङ्ग (उड़ने वाले फतिङ्गे यथा-शलभ, टिड्डी आदि), विष्ठा खाने वाले (कौआ आदि) तथा हिंसक (बाघ, सिंह, भेड़िया आदि) जीवों की योनि को प्राप्त करता है।
सोने को चुराने वाला ब्राह्मण मकड़ी, साँप, गिरगिट, जलचर जीव (मगर आदि), हिंसाशील तथा प्रेतों की योनि को हजारों बार प्राप्त करता है।
गुरुतल्पग (गुरु (२।१४२) की स्त्री के साथ सम्भोग करने वाला) मनुष्य तृण, गुल्म, लता, कच्चे मांस को खाने वाले (गीध आदि) तथा दंष्ट्री (बाघ, सिंह कुत्ता आदि) जीव और क्रूर कर्म करने वाले (बाघ, सिंह या जल्लाद आदि) की योनि को सैकड़ों बार प्राप्त करते हैं।
हिंसक (सदा हिंसा करने वाले बहेलिया, शिकारी आदि) मनुष्य क्रव्याद (कच्चे मांस खाने वाले बिलाव आदि) होते हैं, अभक्ष्य पदार्थो को खाने वाले मनुष्य कृमि (विष्ठादि के बहुत छोटे-छोटे कीड़े) होते हैं, (महापातक से भिन्न) चोर परस्पर में एक दूसरे को खाने वाले होते हैं और चण्डाल आदि हीनतम जातियों की स्त्रियों के साथ सम्भोग करने वाले प्रेत होते हैं।
पतितों के साथ संसर्ग (११।१८०) कर, परस्त्री के साथ सम्भोग कर और ब्राह्मण के (सुवर्ण-भिन्न) धन का अपहरण कर मनुष्य ब्रह्मराक्षस होता है।
मनुष्य मणि, मूँगा और अनेक प्रकार के रत्नों के लोभ से (आत्मीय होने के भ्रम से नहीं) हरणकर सुनार (या हेमकार पक्षी) की योनि में उत्पन्न होता है।
मनुष्य धान्य चुराकर चूहा, कांसा चुराकर हंस, जल चुराकर प्लव नामक पक्षी, शहद चुराकर दंश (डांस), दूध चुराकर कौवा, (विशिष्ट रूप से कथित गुड नमक आदि के अतिरिक्त) गन्ने आदि का रस चुराकर कुत्ता और घी चुराकर नेवला होता है।
मांस चुराकर गीध, चर्बी चुराकर मद्गु नामक जलचर, तैल चुराकर तैलपक नामक पक्षी (या 'तेलचवटा' नामक उड़ने वाला कीड़ा), नमक चुराकर झीङ्गुर और दही चुराकर बलाका पक्षी होता है।
रेशमी वस्त्र (या सूत) चुराकर तीतर पक्षी, क्षौम (तोसी आदि के छाल से बना) वस्त्र चुराकर मण्डूक (मेढ़क), रुई से बना अर्थात्‌ सूती वस्त्र चुराकर क्रौञ्च पक्षी, गौ को चुराकर गोह और गुड़ चुराकर वाग्गुद पक्षी होता है।
उत्तम गन्ध (कस्तूरी, कर्पूर आदि) चुराकर छुछुन्दरी, पत्तों वाला (बथुआ, पालक आदि) शाक चुराकर मोर, सिद्धान्न (मोदक, लडू, सत्तू, भात आदि) चुराकर शाही (काँटेदार सम्पूर्ण शरीर वाला छोटे कुत्तों के बराबर ऊँचा पशु-विशेष), कच्चा अन्न (चावल, धान गेहूँ, जौ, चना, दाल आदि) चुराकर, शल्यक होता है।
अग्नि चुराकर बगुला, गृहोपयोगी (सूप, चलनी, ओखली, मूसल आदि) साधन चुराकर लोहनी नामक कीड़ा (जो मिट्टी से लम्बा या गोल आकार वाले अपने घर को दिवालों या धरन आदि काष्छों पर बनाता है) और कुसुम्भ आदि से) रङ्गा गया वस्त्र चुराकर चकोर पक्षी होता है।
मृग (हरिण) या हाथी चुराकर भेड़िया, घोड़ा चुराकर बाघ, फल तथा मूल चुराकर बानर, स्त्री चुराकर भालू, (पीने के लिए) पानी चुराकर चातक पक्षी, (एक्का, तांगा, रेक्सा गाड़ी आदि) सवारी चुराकर ऊंट और (इस प्रकरण में अकथित) पशुओं को चुराकर छाग होता है।
मनुष्य दूसरे की नि:सार (साधारणतम) भी वस्तु को बलात्कार से लेकर तथा बिन हवन किये (पुरोडाश आदि) हविष्य को खाकर अवश्य ही तिर्यग्योनि को पाता है।
इस प्रकार स्त्रियाँ भी इच्छापूर्वक (इन वस्तुओं को) चुराकर दोषभागिनी होती हैं और वे इन्हीं (१२।६२-६८) जीवों की स्त्रियाँ होती हैं।
(इस प्रकार शा्रनिषिद्ध कर्मो के आचरण करने पर फलों को कहकर अब शास्त्रविहित कर्मो के नहीं करने पर होने वाले फलों को कहते हैं) वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र) आपत्तिकाल नहीं होने पर भी अपने-अपने कर्मो से भ्रष्ट होकर (शास्त्रविहित पञ्चमहायज्ञ आदि कर्मो को छोड़कर) निन्दित योनियों को पाकर जन्मान्तर में शत्रुओं के यहाँ दास होते हैं।
अपने धर्म से भ्रष्ट ब्राह्मण वान्तभोजी (वसन्‌ किये हुए अन्नादि को खानेवाला) तथा ज्वालायुक्त (ज्वलनशील-जलते हुए) मूखवाला प्रेत होता है और (अपने धर्म से भ्रष्ट) क्षत्रिय अपवित्र (विष्ठा) तथा शव को खानेवाला 'कटपूतन' नामक प्रेत होता है।
अपने कर्म से भ्रष्ट हुआ वैश्य पीब खानेवाला 'मैत्राक्षज्योतिष्क' नामक प्रेत होता है (इसका गुद ही कर्मेन्द्रिय होता है) और अपने धर्म में भ्रष्ट शूद्र 'चैलाशक' (वस्त्रों की 'जूँ' को खानेवाला) नामक प्रेत होता है।
विषयी मनुष्य विषयों को जैसे-जैसे (जितनी अधिक मात्रा में) सेवन करते हैं, उन (विषयों) में वैसे-वैसे (उतनी अधिक मात्रा में) कुशलता प्रवीणता (अर्थात्‌ वृद्धि, आसक्ति) होती जाती है।
(अतः) वे मन्दबुद्धि उन पाप कर्मो के अभ्यास (निरन्तर सेवन) से उन-उन योनियों में दुःखों को प्राप्त करते हैं।
(वे क्षुद्रबुद्धि पापी मनुष्य) (४।८८-९०) तामिस्र आदि घोर नरकों में दुःख पाते हैं तथा असिपत्रवन आदि नरकों का और बन्धन, छेदन आदि दुःखों को पाते हैं।
(वे क्षुद्रबुद्धि पापी मनुष्य) अनेक प्रकार की पीड़ाओं को भोगते हैं, उन्हें कौवे और उल्लू खाते हैं, वे सन्तप्त बालू (रेत) में सन्ताप को पाते हैं और कुम्भीपाक आदि दारुण नरकों को भोगते हैं।
(वे क्षुद्रबुद्धि पापी मनुष्य) अधिक दुःखदायी (तिर्यक्‌ आदि) निषिद्ध योनियों में उत्पत्ति (जन्म) को और शीत तथा आतप (ठंडक तथा धूप) की भयङ्कर विविध पीड़ाओं को प्राप्त करते हैं।
(वे क्षुद्रबुद्धि पापी मनुष्य) अनेक बार गर्भ में निवास, जन्मग्रहण, अनेक प्रकार के कष्टकारक बन्धन (जन्य पीड़ाओं) को पाते हैं तथा दूसरों के दास बनते हैं।
(वे क्षुद्रबुद्धि पापी मनुष्य) प्रियबन्धुओं के वियोग, दुष्टों के सहवास, धनोपार्जन का प्रयास, नाश, कष्ट से मित्रों का लाभ और शत्रुओं का प्रादुर्भाव (नये-नये शत्रुओं का होना) को प्राप्त करते हैं।
(वे क्षुद्रबुद्धि पापी मनुष्य) प्रतिकार रहित बुढ़ापा, व्याधियों से उपपीडन (भूख-प्यास आदि से) अनेक प्रकार के क्लेश और दुर्जय मृत्यु को पाते हैं।
मनुष्य जिस प्रकार के (भले या बुरे) भावों से जिन-जिन (भले या बुरे) कर्मों का सेवन करता है, वह वैसे (भले या बुरे) शरीर से उन-उन (भले या बुरे) कर्मफलों को प्राप्त करता है।
(भृगुजी महर्षियों से कहते हैं कि मैंने) आप लोगों से इन (१२।५५-८१) कर्मा के फलों को सम्पूर्ण उत्पत्ति को कहा, अब मोक्ष के लिए ब्राह्मण के कर्म को आप लोग सुनें।
(उपनिषद्‌ के सहित) वेद का अभ्यास, (प्राजापत्य आदि) तप, (ब्रह्मविषयक) ज्ञान, इन्द्रियों का संयम, अहिंसा और गुरुजनों की सेवा - ये ब्राह्मण के लिए श्रेष्ठ मोक्षसाधक छः कर्म हैं।
इन सब (१२।८३) शुभ कर्मों में भी मनुष्य के लिए अधिक शुभकारक कोई कर्म है।
इन सब (१२।८३) कर्मो में भी उपनिषद्वर्णित ब्रह्मज्ञान ही सर्वश्रेष्ठ कहा गया है, वही सब विद्याओं में प्रधान है, इस कारण उससे अमृत (मोक्ष) की प्राप्ति होती है।
(१२।८३) सब छः कर्मो में से मरने के बाद (परलोक में) तथा (जीवित रहने पर) इस संसार में वैदिक कर्म को सर्वदा कल्याणकारक समझना चाहिये।
(परमात्मोपासनरूप) वैदिक कर्मयोग में ये सभी (ऐहलौकिक तथा पारलौकिक कल्याण) उस उपासना विधि में सम्पूर्ण भाव से क्रमशः अन्तर्भूत हो जाते हैं अथवा वैदिक कर्मयोग में ये (१२।८३) सभी वेदाभ्यासादि षट्कर्म परमात्मज्ञान में अन्तर्भूत हो जाते हैं।
वैदिक कर्म दो प्रकार के होते हैं - पहला स्वगादि सुखसाधक संसार में प्रवृत्ति कराने वाला (ज्योतिष्टोमादिरूप) प्रवृत्त कर्म तथा दूसरा निःश्रेयस (मुक्ति) साधक संसार से निवृत्ति कराने वाला (प्रतीकोपासनादिरूप) निवृत्त कर्म।
इस लोक में या परलोक में इच्छापूर्वक (सकाम भाव से) किया गया ज्योतिष्टोमादि (यज्ञरूप) कर्म (संसार प्रवृत्तिसाधक होने से) 'प्रवृत्त कर्म' कहा जाता है और इच्छारहित (निष्काम भाव से) ब्रह्मज्ञान के अभ्यासपूर्वक किया गया कर्म (संसार-निवृत्तिसाधक होने से) 'निवृत्त कर्म' कहा जाता है।
(मनुष्य) प्रवृत्तकर्म का सेवन कर देवों की समानता (स्वर्ग) पाता है और निवृत्त कर्म का सेवन करता हुआ पञ्चभूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश) का अतिक्रमण करता अर्थात्‌ पुनर्जन्मरहित होकर मोक्ष पाता है।
सम्पूर्ण (चराचर) जीवों में आत्मा को तथा आत्मा में सम्पूर्ण (चराचर) जीवों को देखता हुआ आत्मयाजी (ब्राह्यार्पण न्याय से ज्योतिष्टोमादि करने वाला) ब्रह्मत्व अर्थात्‌ मुक्ति को पाता है।
द्विजोत्तम (ब्राह्मण) शास्त्रोक्त (अग्निहोत्रादि) कर्मो का त्यागकर भी ब्रह्मध्यान, इन्द्रियनिग्रह और (प्रणव, उपनिषद्‌ आदि) वेद के अभ्यास में प्रयत्नशील रहे।
यही (आत्मज्ञान, वेदाभ्यासादि ही) द्विज को, विशेषकर ब्राह्मण के जन्म की सफलता है; क्योंकि इसे पाकर द्विज कृतकृत्य हो जाता है, अन्यथा (दूसरे किसी प्रकार से) कृतकृत्य नहीं होता।
पितर, देव तथा मनुष्यों का सनातन नेत्र वेद ही है, यह वेद अपौरुषेय (किसी पुरुष का नहीं बनाया हुआ) और अप्रमेय (मीमांसा, न्याय आदि से) निरक्षेप है ऐसी शास्त्र-व्यवस्था है।
जो स्मृतियाँ वेदबाह्य (अवेदमूलक) हैं तथा जो कोई कुदृष्टि (चार्वाकादि कृत शास्त्र) हैं, वे सब परलोक में निष्फल है; क्योंकि उन्हें (मनु आदि महर्षियों ने) तमःप्रधान कहा है।
इस (वेद) से भिन्न जो शास्त्र रचे जाते तथा नष्ट होते हैं, वे सब अर्वाचीन आधुनिक अर्थात्‌ इस समय के (रचे हुए) होने से निष्फल तथा असत्य हैं।
पृथक्‌-पृथक चारों वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र), तीनों लोक (स्वर्ग, मृत्यु और पाताल), चारों आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास) और भूत, भविष्य तथा वर्तमान (क्रमशः जो कुछ हुआ होगा तथा हो रहा है) वह सब वेद से ही प्रसिद्ध होते हैं।
(इस लोक तथा परलोक में) शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवाँ गन्ध, ये सब गुण (सत्त्व, रज और तम) निमित्तक वैदिक कर्महेतुक होने से वेद से ही प्रसिद्ध होते हैं।
सनातन (नित्य) यह वेदशास्त्र सम्पूर्ण भूतों को धारण करता है, इस कारण से (मैं) इस जीव का उत्तम पुरुषार्थ-साधन वेद को मानता हूँ।
वेद ज्ञाता मनुष्य सेनापतित्व, राज्य, दण्डप्रणेतृत्व (न्यायाधीश-जज आदि होने) और सम्पूर्ण लोकों के स्वामित्व के योग्य है।
जिस प्रकार प्रबल (धधकती हुई) अग्नि गीले (नहीं सूखे हुए) वृक्षों को भी जला देती है, उसी प्रकार वेदज्ञाता मनुष्य अपने निषिद्ध कर्मों (से उत्पन्न पापों) को भी नष्ट कर देता है।
वेदशास्त्र के वास्तविक अर्थ को जानने वाला जिस किसी आश्रम में रहता हुआ इसी लोक में ब्राह्मभाव के लिए समर्थ होता है।
आज्ञों (कुछ अंश पढ़े हुए) से सम्पूर्ण ग्रन्थ पढ़े हुए लोग श्रेष्ठ हैं, उन (सम्पूर्ण ग्रन्थ को पढ़े हुए लोगों) से उस सम्पूर्ण ग्रन्थ को धारण करने वाले श्रेष्ठ हैं, उन (सम्पूर्ण ग्रन्थ धारण करने वालों) से ज्ञानी (पढ़े हुए सम्पूर्ण ग्रन्थ के अर्थ को जानने वाले) श्रेष्ठ हैं और उन (ज्ञानियों) से व्यवसायी (वेद-विहित कर्मो का आचरण करने वाला) श्रेष्ठ हैं।
तप (ब्रह्मचर्य, गृहस्थादि आश्रमोक्त धर्म) और विद्या (आत्मज्ञान) ये दोनों ब्राह्मण के लिए उत्तम मोक्षसाधन हैं; उनमें वह तप से पाप को नष्ट करता है तथा विद्या से मोक्ष को प्राप्त करता है।
धर्म के तत्त्व को जानने के इच्छुक को (धर्म-साधनभूत द्रव्य-गुण-जातित्व के ज्ञान के लिए) प्रत्यक्ष तथा अनुमान का और अनेकविधि धर्मस्वरूप के ज्ञान के लिए वेदमूलक विविध स्मृत्यादिरूप शास्त्र का ज्ञान अच्छी तरह करना चाहिए; ये ही तीनों (प्रत्यक्ष, अनुमान तथा शास्त्र) मनु-सम्मत प्रमाण हैं। (उपमान, अर्थापत्ति आदि प्रमाणों का अनुमान में अन्तर्भाव समझना चाहिए)।
जो मनुष्य ऋषिदृष्ट वेद तथा तन्मूलक स्मृति शास्त्रों को वेदानुकूल तर्क से विचारता है, वही धर्मज्ञ है, दूसरा नहीं।
(भृगुजी महर्षियों से कहते हैं कि) मुक्तिसाधक इस (१२।८३-१०६) सम्पूर्ण कर्म को (मैंने) यथावत्‌ कहा, अब (मैं) इस मानव (मनु भगवान्‌ के रचे हुए) शास्त्र के रहस्य (गोपनीय विषय) को (१२।१०८-११५) कहता हूँ, (उसे आप लोग सुने)।
(सामान्य रूप से कथित, किन्तु विशेष रूप से) अकथित धर्मस्थल में किस प्रकार का आचरण करना चाहिये ऐसा सन्देह होने पर जिस धर्म को शिष्ट ((१२।१०९) ब्राह्मण बतलावें, वही धर्म सन्देहरहित है (अतएव उसी शिष्टोक्त धर्म का आचरण करना चाहिये)।
धर्म से (ब्रह्मचर्यादि आश्रम में निवासकर, व्याकरण-मीमांसादि शास्त्र से) परिस्फुट वेद को जिन्होंने पढ़ा है, वेद (के तत्त्व) को प्रत्यक्ष करनेवाले उन ब्राह्मणों को 'शिष्ट' जानना चाहिए।
कम से कम दश (१२।१११) सदाचारी ब्राह्मणों की सभा (कमेटी) या (उतना नही मिलने पर) तीन (१२।१ १२) ब्राह्मणों की सभा जिस धर्म का निर्णय करे, उस धर्म का उल्लङ्घन नहीं करना चाहिए।
तीनों वेद की तीनों शाखाओं, श्रुति-स्मृति के अविरुद्ध न्यायशास्त्र, मीमांसाशास्त्र, निरुक्त और मनु आदि महर्षियो द्वारा प्रणीत धर्मशास्त्रो को पढे हुए, प्रथम तीन (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ तथा वानप्रस्थ) आश्रम में रहनेवाले दश ब्राह्मणों की परिषद्‌ (सभाकमेटी, धर्म निर्णय करने में समर्थ) होती है।
ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद को पढ़ने और उसके तत्त्व को जानने वाले कम से कम तीन ब्राह्मणों की सभा धर्म-सम्बन्धी सन्देह के निश्चय करने में समर्थ होती है।
(अथवा तीन विद्वान्‌ ब्राह्मणों (१२।११२) के नहीं मिलने पर) वेदतत्त्वज्ञाता एक भी ब्राह्मण जिसको धर्म निश्चित करे, उसे ही श्रेष्ठ धर्म समझना चाहिये, दश सहस्र मूर्खो से कहा हुआ धर्म नहीं है।
(सावित्री ब्रह्मचर्यादि) व्रतो से हीन, मन्त्र (वेदाध्ययन से) रहित और जातिमात्र से ब्राह्मण कहलाकर जीने वाले एकत्रित सहस्रों ब्राह्मणों की भी परिषद्‌ (सभा, धर्मनिर्णायक) नहीं होती है।
अधिक तमोगुण वाले मूर्ख वेदोक्त धर्मज्ञान से शून्य (ब्राह्मण नामधारी व्यक्ति) जिस पुरुष को प्रायश्चित्त आदि धर्म का उपदेश देते हैं, उस पुरुष का वह पाप सौगुना होकर उन धर्मोपदेशकों को लगता है।
(भृगुजी महर्षियों से कहते हैं कि मैंने) आप लोगों से परमकल्याणकारक यह (१२।१०८-११५) धर्म कहा, इस धर्म से भ्रष्ट नहीं होने वाला अर्थात्‌ सर्वदा इसका पालन करने वाला विप्र श्रेष्ठ गति को प्राप्त करता है।
(भृगुजी पुनः महर्षियों से कहते हैं कि) इस प्रकार भगवान्‌ मनु देव ने संसार के हित की कामना से धर्म का सब परम रहस्य मुझ (भृगु) से कहा।
ब्राह्मण सावधान चित्त होकर समस्त सत्‌ तथा असत्‌ को आत्मा में वर्तमान देखे, सब (सत्‌ तथा असत्‌) को आत्मा में वर्तमान देखता (जानता) हुआ वह ब्राह्मण अधर्म में मन को नहीं लगाता है।
(इन्द्र आदि) सब देवता आत्मा अर्थात्‌ परमात्मा ही है, सब संसार आत्मा में ही अवस्थित है और आत्मा ही इन देहियों (जीवों) के कर्मसम्बन्ध को उत्पन्न करता है।
(इस समय आगे (१२।१२ १) कहे जाने वाले ब्रह्मध्यान के लिए विशेष उपयोगी होने से दैहिक आकाशादि का ब्राह्म आकाशादि में लय होना कहते हैं-) नासिका उदर आदि सम्बन्धी शारीरिक आकाश में बाह्य आकाश को, चेष्टा तथा स्पर्शरूप शारीरिक वायु में बाह्य वायु को, उदर सम्बन्धि और नेत्र सम्बन्धी शारीरिक तेज में उत्कृष्ट (सूर्य-चन्द्र-सम्बन्धी) बाह्य तेज को, शारीरिक स्नेह (जल) में बाह्य जल को, शारीरिक पार्थिव (पृथ्वी-सम्बन्धी) भागों में बाह्य पृथ्वी को।
मन में चन्द्रमा को, कानों में दिशाओं को, चरणों में विष्णु को, बल (सामर्थ्य) में शिव को, वचन में अग्नि को, गुदा में मित्र को, शिश्न में प्रजापति को लीन (हुआ समझकर) एकत्व की भावना करे।
(इस प्रकार (१२।१२०-१२१) आत्मा में लीन बाह्य भूतों (आकाशादिकों) की भावना करके) सम्पूर्ण चराचर जगत्‌ का शासक, सूक्ष्म से भी अधिक 'सूक्ष्मतम', (उपासना (ध्यान) के लिए) सुवर्ण के समान (देदीप्यमान), स्वप्नबुद्धि के (प्रसन्न मन से) ग्रहण करने योग्य उस श्रेष्ठ पुरुष (परमात्मा) का चिन्तन (ध्यान) करे।
इस (परम पुरुष परमात्मा) को कुछ लोग (याज्ञिक-अध्वर्यु) अग्नि, कुछ लोक (सृष्टिकर्ता) प्रजापति मनु, कुछ लोग (ऐश्वर्यसम्पन्न होने से) इन्द्र, कुछ लोग प्राण तथा कुछ लोग शाश्वत (सनातन अर्थात्‌ नित्य) ब्रह्म कहते हैं।
यह (परमात्मा) सम्पूर्ण प्राणियों में शरीरों को आरम्भ करने वाली पञ्च मूर्तियों (पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाशरूप पञ्चमहाभूतों) से व्याप्त होकर उत्पत्ति, स्थिति और विनाश (क्रमश: जन्म, स्थिति तथा मरण के द्वारा (निरन्तर परिवर्तनशील रथ के) पहिए के समान संसारियों को सर्वदा बनाता रहता है।
इस प्रकार (१२।११८-१२४) सम्पूर्ण जीवों में स्थित आत्मा (परमात्मा) को आत्मा के द्वारा जो देखता है, वह सब में समानता प्राप्त कर ब्रह्मरूप परमपद (मोक्ष) को प्राप्त करता है।
भृगुजी के द्वारा कहे गये इस मानव (मनु द्वारा प्रतिपादित) शास्त्र को पढ़ता हुआ द्विज (इसमें विहित कर्मों का आचरण तथा वर्जित कर्मो का त्याग करने से) सदाचारी होता है और यथेष्ट (अपनी इच्छा के अनुसार, स्वर्ग तथा मोक्ष आदि) गति को प्राप्त करता है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें