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मनुस्मृति • अध्याय 12 • श्लोक 71
वान्ताश्युल्कामुखः प्रेतो विप्रो धर्मात्स्वकाच्च्युतः । अमेध्यकुणपाशी च क्षत्रियः कूटपूतनः ।।
अपने धर्म से भ्रष्ट ब्राह्मण वान्तभोजी (वसन्‌ किये हुए अन्नादि को खानेवाला) तथा ज्वालायुक्त (ज्वलनशील-जलते हुए) मूखवाला प्रेत होता है और (अपने धर्म से भ्रष्ट) क्षत्रिय अपवित्र (विष्ठा) तथा शव को खानेवाला 'कटपूतन' नामक प्रेत होता है।
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