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मनुस्मृति • अध्याय 12 • श्लोक 101
यथा जातबलो वह्निर्दहत्याद्रनिपि द्रुमान्‌ । तथा दहति वेदज्ञः कर्मजं दोषमात्मनः ।।
जिस प्रकार प्रबल (धधकती हुई) अग्नि गीले (नहीं सूखे हुए) वृक्षों को भी जला देती है, उसी प्रकार वेदज्ञाता मनुष्य अपने निषिद्ध कर्मों (से उत्पन्न पापों) को भी नष्ट कर देता है।
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