यो यदैषां गुणो देहे साकल्येनातिरिच्यते ।
स तदा तहुणप्राय तं करोति शरीरिणम् ।।
यद्यपि यह सम्पूर्ण जगत् इन तीनों ही गुणों (सत्त्व, रज और तम) से व्याप्त है, (तथापि) इन गुणों में से जो गुण सबसे अधिक होता है, वह गुण उस देहधारी को उस गुण की (अपनी) अधिकता से युक्त कर देता है।
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