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मनुस्मृति • अध्याय 12 • श्लोक 65
छुच्छुन्दरी: शुभान्गन्धान्पत्रशाक तु बर्हिणः । श्वावित्कृतान्नं विविधमकृतान्नं तु शल्यकः ।।
उत्तम गन्ध (कस्तूरी, कर्पूर आदि) चुराकर छुछुन्दरी, पत्तों वाला (बथुआ, पालक आदि) शाक चुराकर मोर, सिद्धान्न (मोदक, लडू, सत्तू, भात आदि) चुराकर शाही (काँटेदार सम्पूर्ण शरीर वाला छोटे कुत्तों के बराबर ऊँचा पशु-विशेष), कच्चा अन्न (चावल, धान गेहूँ, जौ, चना, दाल आदि) चुराकर, शल्यक होता है।
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