मनुष्य जिस काम (वेदार्थ) को सम्पूर्ण आत्मा से अर्थात् सब प्रकार मन लगाकर जानना चाहता है तथा जिस काम को करता हुआ लज्जित नहीं होता और जिस काम से आत्मा प्रसन्न होती है; उसे "सात्त्विक गुण" का लक्षण समझना चाहिए।
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