(इस प्रकार (१२।१२०-१२१) आत्मा में लीन बाह्य भूतों (आकाशादिकों) की भावना करके) सम्पूर्ण चराचर जगत् का शासक, सूक्ष्म से भी अधिक 'सूक्ष्मतम', (उपासना (ध्यान) के लिए) सुवर्ण के समान (देदीप्यमान), स्वप्नबुद्धि के (प्रसन्न मन से) ग्रहण करने योग्य उस श्रेष्ठ पुरुष (परमात्मा) का चिन्तन (ध्यान) करे।
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