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मनुस्मृति • अध्याय 12 • श्लोक 41
त्रिविधा त्रिविधैषा तु विज्ञेया गौणिकी गतिः । अधमा मध्यमाग्र्या च कर्मविद्याविशेषतः ।।
(सत्त्वादि तीनों गुणों के कारण) तीन प्रकार की ये गतियाँ (देवगति, मनुष्यगति तथा तिर्यग्गति) कर्म तथा विद्या आदि की विशेषता से जघन्य, मध्यम तथा उत्तम - पुनः तीन प्रकार की अप्रधान गतियाँ होती हैं। इस प्रकार ३ x ३ = ९ अप्रधान गतियाँ होती हैं)।
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