महापातकी (ब्रह्महत्या आदि (११।५४) करनेवाले) बहुत वर्ष समूहों तक भयङ्कर नरकों को पाकर उनके उपभोग क्षय से इन (आगे (१२।५५-८०) कही जाने वाली गतियों को प्राप्त करते हैं।
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