(भृगुजी महर्षियों से कहते हैं कि) मुक्तिसाधक इस (१२।८३-१०६) सम्पूर्ण कर्म को (मैंने) यथावत् कहा, अब (मैं) इस मानव (मनु भगवान् के रचे हुए) शास्त्र के रहस्य (गोपनीय विषय) को (१२।१०८-११५) कहता हूँ, (उसे आप लोग सुने)।
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