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मनुस्मृति • अध्याय 12 • श्लोक 107
नैःश्रेयसमिदं कर्म यथोदितमशेषतः । मानवस्यास्य शास्त्रस्य रहस्यमुपदेक्ष्यते ।।
(भृगुजी महर्षियों से कहते हैं कि) मुक्तिसाधक इस (१२।८३-१०६) सम्पूर्ण कर्म को (मैंने) यथावत्‌ कहा, अब (मैं) इस मानव (मनु भगवान्‌ के रचे हुए) शास्त्र के रहस्य (गोपनीय विषय) को (१२।१०८-११५) कहता हूँ, (उसे आप लोग सुने)।
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