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मनुस्मृति • अध्याय 12 • श्लोक 116
एतद्वोञभिहितं सर्व निःश्रेयसकरं परम्‌ । अस्मादप्रच्युतो विप्रः प्राप्नोति परमां गतिम्‌ ।।
(भृगुजी महर्षियों से कहते हैं कि मैंने) आप लोगों से परमकल्याणकारक यह (१२।१०८-११५) धर्म कहा, इस धर्म से भ्रष्ट नहीं होने वाला अर्थात्‌ सर्वदा इसका पालन करने वाला विप्र श्रेष्ठ गति को प्राप्त करता है।
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