इस लोक में या परलोक में इच्छापूर्वक (सकाम भाव से) किया गया ज्योतिष्टोमादि (यज्ञरूप) कर्म (संसार प्रवृत्तिसाधक होने से) 'प्रवृत्त कर्म' कहा जाता है और इच्छारहित (निष्काम भाव से) ब्रह्मज्ञान के अभ्यासपूर्वक किया गया कर्म (संसार-निवृत्तिसाधक होने से) 'निवृत्त कर्म' कहा जाता है।
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