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मनुस्मृति • अध्याय 12 • श्लोक 10
वाग्दण्डोऽथ मनोदण्डः कायदण्डस्तथैव च । यस्यैते निहिता बुद्धौ त्रिदण्डीति स उच्यते ।।
जिसकी बुद्धि (विचार-मन) में वाग्दण्ड, मनोदण्ड और शरीरदण्ड; ये तीनों स्थित हैं, वही (सच्चा) 'त्रिदण्डी' (तीन दण्डों वाला-संन्यासी) कहा जाता है, (केवल बाँस का तीन दण्ड धारण करनेवाला ही संन्यासी नहीं है)।
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