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मनुस्मृति • अध्याय 12 • श्लोक 57
लूताहिसरटानां च तिरश्चां चाम्बुचारिणाम्‌ । हिंस्राणां च पिशाचानां स्तेनो विप्रः सहस्रशः ।।
सोने को चुराने वाला ब्राह्मण मकड़ी, साँप, गिरगिट, जलचर जीव (मगर आदि), हिंसाशील तथा प्रेतों की योनि को हजारों बार प्राप्त करता है।
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