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मनुस्मृति • अध्याय 12 • श्लोक 79
बन्धुप्रियवियोगांश्च संवासं चैव दुर्जनैः । द्रव्यार्जनं च नाशं च मित्रामित्रस्य चार्जनम्‌ ।।
(वे क्षुद्रबुद्धि पापी मनुष्य) प्रियबन्धुओं के वियोग, दुष्टों के सहवास, धनोपार्जन का प्रयास, नाश, कष्ट से मित्रों का लाभ और शत्रुओं का प्रादुर्भाव (नये-नये शत्रुओं का होना) को प्राप्त करते हैं।
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