बन्धुप्रियवियोगांश्च संवासं चैव दुर्जनैः ।
द्रव्यार्जनं च नाशं च मित्रामित्रस्य चार्जनम् ।।
(वे क्षुद्रबुद्धि पापी मनुष्य) प्रियबन्धुओं के वियोग, दुष्टों के सहवास, धनोपार्जन का प्रयास, नाश, कष्ट से मित्रों का लाभ और शत्रुओं का प्रादुर्भाव (नये-नये शत्रुओं का होना) को प्राप्त करते हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मनुस्मृति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
मनुस्मृति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।