पितृदेवमनुष्याणां वेदश्चक्षुः सनातनम् ।
अशक्यं चाप्रमेयं च वेदशास्त्रमिति स्थितिः ।।
पितर, देव तथा मनुष्यों का सनातन नेत्र वेद ही है, यह वेद अपौरुषेय (किसी पुरुष का नहीं बनाया हुआ) और अप्रमेय (मीमांसा, न्याय आदि से) निरक्षेप है ऐसी शास्त्र-व्यवस्था है।
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