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मनुस्मृति • अध्याय 12 • श्लोक 108
अनाम्नातेषु धर्मेषु कथं स्यादिति चेद्भवेत्‌ । यं शिष्टा ब्राह्मणा ब्रूयुः स धर्मः स्यादशङ्कितः ।।
(सामान्य रूप से कथित, किन्तु विशेष रूप से) अकथित धर्मस्थल में किस प्रकार का आचरण करना चाहिये ऐसा सन्देह होने पर जिस धर्म को शिष्ट ((१२।१०९) ब्राह्मण बतलावें, वही धर्म सन्देहरहित है (अतएव उसी शिष्टोक्त धर्म का आचरण करना चाहिये)।
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