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मनुस्मृति • अध्याय 12 • श्लोक 111
त्रैविद्यो हेतुकस्तर्की नैरुक्तो धर्मपाठकः । त्रयश्चाश्रमिणः पूर्वे परिषत्स्याद्दशावरा ।।
तीनों वेद की तीनों शाखाओं, श्रुति-स्मृति के अविरुद्ध न्यायशास्त्र, मीमांसाशास्त्र, निरुक्त और मनु आदि महर्षियो द्वारा प्रणीत धर्मशास्त्रो को पढे हुए, प्रथम तीन (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ तथा वानप्रस्थ) आश्रम में रहनेवाले दश ब्राह्मणों की परिषद्‌ (सभाकमेटी, धर्म निर्णय करने में समर्थ) होती है।
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