सर्वमात्मनि संपश्येत्सच्चासच्च समाहितः ।
सर्व ह्यात्मनि संपश्यन्नाधर्मे कुरुते मतिम् ।।
ब्राह्मण सावधान चित्त होकर समस्त सत् तथा असत् को आत्मा में वर्तमान देखे, सब (सत् तथा असत्) को आत्मा में वर्तमान देखता (जानता) हुआ वह ब्राह्मण अधर्म में मन को नहीं लगाता है।
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