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मनुस्मृति • अध्याय 12 • श्लोक 68
यद्वा तद्वा परद्रव्यमपहृत्य बलान्नरः । अवश्यं याति तिर्यक्त्वं जग्ध्वा चैवाहुतं हविः ।।
मनुष्य दूसरे की नि:सार (साधारणतम) भी वस्तु को बलात्कार से लेकर तथा बिन हवन किये (पुरोडाश आदि) हविष्य को खाकर अवश्य ही तिर्यग्योनि को पाता है।
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