प्रत्यक्षं चानुमानं च शास्त्रं च विविधागमम् ।
त्रयं सुविदितं कार्य धर्मशुद्धिमभीप्सता ।।
धर्म के तत्त्व को जानने के इच्छुक को (धर्म-साधनभूत द्रव्य-गुण-जातित्व के ज्ञान के लिए) प्रत्यक्ष तथा अनुमान का और अनेकविधि धर्मस्वरूप के ज्ञान के लिए वेदमूलक विविध स्मृत्यादिरूप शास्त्र का ज्ञान अच्छी तरह करना चाहिए; ये ही तीनों (प्रत्यक्ष, अनुमान तथा शास्त्र) मनु-सम्मत प्रमाण हैं। (उपमान, अर्थापत्ति आदि प्रमाणों का अनुमान में अन्तर्भाव समझना चाहिए)।
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