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मनुस्मृति • अध्याय 12 • श्लोक 113
एकोऽपि वेदविद्धर्म यं व्यवस्येद्द्विजोत्तमः । स विज्ञेयः परो धर्मो नाज्ञानामुदितोऽ युतैः ।।
(अथवा तीन विद्वान्‌ ब्राह्मणों (१२।११२) के नहीं मिलने पर) वेदतत्त्वज्ञाता एक भी ब्राह्मण जिसको धर्म निश्चित करे, उसे ही श्रेष्ठ धर्म समझना चाहिये, दश सहस्र मूर्खो से कहा हुआ धर्म नहीं है।
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