येनास्मिन्कर्मणा लोके ख्यातिमिच्छति पुष्कलाम् ।
न च शोचत्यसंपत्तौ तद्विज्ञेयं तु राजसम् ।।
इस लोक में मनुष्य जिस काम में अत्यधिक प्रसिद्धि (नामवरी) को चाहता है और उस काम के असफल होने पर शोक नहीं करता, उसे "राजस गुण" का लक्षण समझें।
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