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मनुस्मृति • अध्याय 12 • श्लोक 28
यत्तुः दुः खसमायुक्तमप्रीतिकरमात्मनः । तद्रजोप्रतिपं विद्यात्सततं हर्तृदेहिनाम्‌ ।।
जो दु:खयुक्त, अप्रीतिकारक तथा शरीरियों को विषयों की ओर आकृष्ट करने वाला प्रतीत हो; उसे सत्त्वज्ञान का प्रतिपक्षी (विरोधी) 'रजोगुण' जानना चाहिये।
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