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मनुस्मृति • अध्याय 12 • श्लोक 87
वैदिके कर्मयोगे तु सर्वाण्येतान्यशेषतः । अन्तर्भवन्ति क्रमशस्तस्मिंस्तस्मिन्क्रियाविधौ ।।
(परमात्मोपासनरूप) वैदिक कर्मयोग में ये सभी (ऐहलौकिक तथा पारलौकिक कल्याण) उस उपासना विधि में सम्पूर्ण भाव से क्रमशः अन्तर्भूत हो जाते हैं अथवा वैदिक कर्मयोग में ये (१२।८३) सभी वेदाभ्यासादि षट्कर्म परमात्मज्ञान में अन्तर्भूत हो जाते हैं।
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