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मनुस्मृति • अध्याय 12 • श्लोक 70
स्वेभ्यः स्वेभ्यस्तु कर्मभ्यश्च्युता वर्णा ह्यनापदि । पापान्संसृत्य संसारान्प्रेष्यतां यान्ति दस्युषु ।।
(इस प्रकार शा्रनिषिद्ध कर्मो के आचरण करने पर फलों को कहकर अब शास्त्रविहित कर्मो के नहीं करने पर होने वाले फलों को कहते हैं) वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र) आपत्तिकाल नहीं होने पर भी अपने-अपने कर्मो से भ्रष्ट होकर (शास्त्रविहित पञ्चमहायज्ञ आदि कर्मो को छोड़कर) निन्दित योनियों को पाकर जन्मान्तर में शत्रुओं के यहाँ दास होते हैं।
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