असकृद्रर्भवासेषु वासं जन्म च दारुणम् ।
बन्धनानि च कष्टानि परप्रेष्यत्वमेव च ।।
(वे क्षुद्रबुद्धि पापी मनुष्य) अनेक बार गर्भ में निवास, जन्मग्रहण, अनेक प्रकार के कष्टकारक बन्धन (जन्य पीड़ाओं) को पाते हैं तथा दूसरों के दास बनते हैं।
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