मनुष्य शरीरिक (१२।७) कर्म के दोषों से स्थावर (वृक्ष, लता, गुल्म, पर्वत आदि) योनि को, वाचिक (१२1६) कर्म के दोषों से पक्षी, मृग (पशु, कीट, पतङ्ग आदि) योनि को और मानसिक (१२।५) कर्म के दोषों से अन्त्य जाति (चण्डाल आदि हीन जाति) को प्राप्त करता है।
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