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मनुस्मृति • अध्याय 12 • श्लोक 61
मणिमुक्ताप्रवालानि हत्वा लोभेन मानवः । विविधानि च रत्नानि जायते हेमकर्तृषु ।।
मनुष्य मणि, मूँगा और अनेक प्रकार के रत्नों के लोभ से (आत्मीय होने के भ्रम से नहीं) हरणकर सुनार (या हेमकार पक्षी) की योनि में उत्पन्न होता है।
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