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मनुस्मृति • अध्याय 12 • श्लोक 59
हिस्त्रा भवन्ति क्रव्यादाः कृमयोऽ मेध्यभक्षिणः । परस्परादिनः स्तेनाः प्ररेताऽन्त्यस्त्रीनिषेविणः ।।
हिंसक (सदा हिंसा करने वाले बहेलिया, शिकारी आदि) मनुष्य क्रव्याद (कच्चे मांस खाने वाले बिलाव आदि) होते हैं, अभक्ष्य पदार्थो को खाने वाले मनुष्य कृमि (विष्ठादि के बहुत छोटे-छोटे कीड़े) होते हैं, (महापातक से भिन्न) चोर परस्पर में एक दूसरे को खाने वाले होते हैं और चण्डाल आदि हीनतम जातियों की स्त्रियों के साथ सम्भोग करने वाले प्रेत होते हैं।
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