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मनुस्मृति • अध्याय 12 • श्लोक 51
एष सर्वः समुद्दिष्टरित्र: प्रकारस्य कर्मणः । त्रिविधस्रिविधः कृत्स्नः संसारः सार्वभौतिकः ।।
(भृगुजी महर्षियो से कहते हैं कि) मन, वचन तथा शरीर के भेद से तीन प्रकार के कर्मा को, (सत्त्व, रज और तम रूप) तीन प्रकार के गुणों को और उनके भी सब प्राणी-सम्बन्धी (जघन्य, मध्यम तथा उत्तम भेद से) तीन-तीन प्रकार की सब गतियों को (मैंने) कहा।
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